मऊ मे आरोपियों के बचाव मे एसडीएम मऊ जाँच मे लगा रहे तथ्यहीन रिपोर्ट

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👉 एक ही भूमि की जाँच मे एसडीएम मऊ नान- जेड- ए और जेड- ए दोनों खातों मे अंकित बता कर नहीं कर रहे कार्यवाही

मऊ। उप जिलाधिकारी मऊ के द्वारा एक ही भूमि को नान- जेड- ए और जेड- ए मे दिखा कर जमीन के मालिकों के बचाव मे बड़ा खेल खेल खेला जा रहा हैं। यह खुलासा आईज़ीआरएस पर पड़ी एक शिकायत के निपटारें को लक्ष्य बनाते हुए अविधिपूर्ण तरीके से नान जेड ए की जमीन को जेड ए मे अंकित करा कर उसकी बिक्री करने वालों के बव मे एसडीएम मऊ द्वारा अपलोड की गईं रिपोर्ट से हुआ हैं।


विभागीय सूत्रों के अनुसार उपजिलाधिकारी मऊ के द्वारा नगर के मौजा सहादतपुरा मे स्थित गाटा संख्या 261/6 को 1369 फसली के राजस्व रिकॉर्ड मे नान -जेड- ए मे दर्ज होना बताते हुए यह शिकायत की गईं थी की जमीन के स्वामियों ने राजस्व विभाग से मिलकर अविधिपूर्ण तरीके से आरोपित भूमि को जेड- ए मे अंकित कर उसको अविधिपूर्ण तरीके से विक्रय कर दिया हैं। आरोपित जमीन को जेड ए मे अअंकन को लेकर राजस्व रिकॉर्ड मे किसी आदेश का उल्लेख नहीं हैं।

शासन मे पड़ी इस शिकायत की जाँच की जिम्मेदारी शासन ने जिलाधिकारी मऊ को सौपी, फिर डीएम द्वारा उपजिलाधिकारी से मामले मे जाँच आख्या तलब की गईं। एसडीएम ने अपनी जाँच मे एक ही जमीन को नान जेड ए और जेड मे दर्शाते हुए, यह कर रिपोर्ट को आईजी आरएस पर रिपोर्ट अपलोड कर दी कि शिकायत सही नहीं पाई गईं।

एसडीएम ने अपनी इस तथाहीन रिपोर्ट को अपलोड कर नान जेड ए की जमीन को बिना किसी आदेश के जेड मे अंकित करने और कराने वालो से लाभ लेकर बचाव कर दिया।

अपनी जाँच रिपोर्ट मे एसडीएम ने उन तथ्यों का उल्लेख भी किया हैं जिन पर शिकायत थी, यानि शिकायत सही भी पाई, लेकिन गलत तरीके से भो स्वामियों के प्रति कार्यवाही नही हूँ इसके लिए शिकायत को जाँच मे जूठा पाए जाने का उल्लेख कर दिया गया, जिससे आरोपियों के खिलाफ शासन कार्यवाही न कर सके।

अपराध की श्रेणी मे हैं बतौर लोकसेवक एसडीएम की तथ्यहीन रिपोर्ट

उच्च न्यायालय के अधिवक्ता ब्रह्मा नन्द पाण्डेय ने एसडीएम मऊ की रिपोर्ट को लेकर कहा की बतौर लोकसेवक एसडीएम मऊ द्वारा किसी भी शिकायतकर्ता की शिकायत को अपने जाँच रिपोर्ट मे सही पाए जाने के बावजूद शिकायत को सही नहीं पाए जाने की रिपोर्ट अपराध की श्रेणी मे आती हैं। किसी भी अधिकारी को तथ्य के बिपरीत जाँच रिपोर्ट देने का अधिकार नहीं हैं। यह उस समय और गंभीर मामला बन जाता हैं ज़ब शिकायत के तथ्य जाँच रिपोर्ट मे उल्लिखित हो और जाँच में जानबूझकर यह लिखा जाये की शिकायत जाँच मे सही नहीं पाई गईं है

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