किसी विशेष धार्मिक समूह को निशाना बनाकर व्हाट्सएप संदेश दुश्मनी को बढ़ावा देने का अपराध : हाईकोर्ट

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प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक विशेष धार्मिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाते हुए कई लोगों को व्हाट्सएप संदेश प्रसारित करना प्रथम दृष्टया धारा 353 (2) बीएनएस के तहत धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा और दुर्भावना की भावना को बढ़ावा देने का अपराध होगा।

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने याचिकाकर्ता (अफाक अहमद) के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की। याची ने कथित तौर पर व्हाट्सएप पर कई व्यक्तियों को भड़काऊ संदेश भेजा था।

याचिका दाखिल कर थाना, चांदपुर, बिजनौर में तैनात दरोगा प्रशांत सिंह द्वारा 23 जुलाई 2025 को धारा 299, एवं 353 (3) भारतीय न्याय संहिता में दर्ज कराई गई प्राथमिकी को चुनौती दी गई थी।

संदेश में याची ने एक सूक्ष्म संदेश दिया था कि उसके भाई को एक झूठे मामले में फंसाया गया है, क्योंकि वह एक विशेष धार्मिक समुदाय से संबंधित है। हाईकोर्ट के समक्ष आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि कथित पोस्ट में याचिकाकर्ता ने अपने भाई की गिरफ्तारी के बारे में केवल नाराजगी व्यक्त की थी और इसका उद्देश्य किसी भी तरह से सार्वजनिक शांति, सौहार्द या सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ना नहीं था।

दूसरी तरफ सरकारी अधिवक्ता ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करने के प्रस्ताव का विरोध किया। पीठ ने कहा कि ये अनकहे शब्द “प्रथम दृष्टया एक विशेष समुदाय से आने वाले नागरिकों के एक वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करेंगे। वे सोचेंगे कि उन्हें एक विशेष धार्मिक समुदाय से संबंधित होने के कारण निशाना बनाया जा रहा है“।

कोर्ट ने कहा, “इसके अलावा, यदि कोई यह भी सोचे कि व्हाट्सएप संदेश से किसी वर्ग के नागरिकों या समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं हुई हैं, तो भी यह निश्चित रूप से एक ऐसा संदेश है, जो अपने अनकहे शब्दों के कारण धार्मिक समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा और दुर्भावना की भावनाओं को पैदा या बढ़ावा दे सकता है, जहां एक विशेष समुदाय के सदस्य, पहली बार में, यह सोच सकते हैं कि उन्हें कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करके दूसरे धार्मिक समुदाय के सदस्यों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है।“

न्यायालय ने कहा कि एक धार्मिक समूह के सदस्यों को निशाना बनाकर कई व्यक्तियों को ऐसा संदेश भेजना प्रथम दृष्टया बीएनएस की धारा 353 (2) के अंतर्गत आता है। इस प्रकार कोर्ट ने यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत पाने का हकदार नहीं है, याचिका को खारिज कर दिया।

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