प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फर्रुखाबाद के वर्ष 1987 के बहुचर्चित हत्या मामले में आरोपित खुन्नी लाल की आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा एवं न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्र प्रथम की खंडपीठ ने उसकी अपील स्वीकार करते हुए दिया है। फर्रुखाबाद के ठठिया थाने में खुन्नी लाल के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे हत्या का दोषसिद्ध पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अभियोजन के अनुसार नौ मई 1987 को जमीन को लेकर विवाद हुआ था। आरोप था कि खुन्नी लाल ने अपने साथियों भगवान दीन और जगदीश के साथ मिलकर मौजी लाल की गर्दन पर चाकू से वार कर हत्या कर दी। ट्रायल कोर्ट ने भगवान दीन और जगदीश को बरी कर दिया था जबकि खुन्नी लाल को दोषी ठहराया गया था।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करते हुए पाया कि एफआईआर में तिथि को लेकर हेर-फेर की आशंका है। कई महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को अभियोजन पक्ष ने पेश नहीं किया। खंडपीठ ने मुख्य गवाह राम सिंह के बयान में गंभीर विरोधाभास पाया। उसने जिरह में कहा कि अंधेरा होने के कारण हमला होते नहीं देखा। अन्य गवाहों के बयान भी आपस में मेल नहीं खाते। पंचनामा और अन्य दस्तावेजों पर एक ही स्याही से अंगूठे के निशान होने से दस्तावेज एक साथ तैयार किए जाने की आशंका व्यक्त की गई। इसके अलावा पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं हुआ कि चोटें निश्चित रूप से आरोपित द्वारा ही पहुंचाई गई थीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। यह भी कहा कि जब तीन आरोपितों के खिलाफ लगभग समान साक्ष्य थे और दो को बरी कर दिया गया तो केवल एक आरोपित को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का 17 मई 1989 का निर्णय निरस्त करते हुए खुन्नी लाल को बरी कर दिया और आदेश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
