कोलकाता, 20 फरवरी (हि.स.)। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान दस्तावेजों की जांच में हो रही देरी के कारण 10 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से हटाए जाने की आशंका उत्पन्न हो गई है। प्रक्रिया से जुड़े सूत्रों के अनुसार अब तक चार लाख से अधिक मतदाताओं के दस्तावेज “अयोग्य” चिह्नित किए जा चुके हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा नियुक्त सूक्ष्म पर्यवेक्षकों ने 4 लाख 44 हजार 970 मतदाताओं के दस्तावेजों को अयोग्य माना है और उनका विवरण आगे की कार्रवाई के लिए आयोग को भेज दिया गया है। इसके अतिरिक्त 4 लाख 66 हजार 323 मतदाताओं के दस्तावेज जिला अधिकारियों के पास सत्यापन के लिए लंबित हैं।
इससे पहले पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत आयोजित सुनवाई में लगभग 7 लाख मतदाता उपस्थित नहीं हुए थे। सुनवाई में अनुपस्थित रहने वालों और अयोग्य घोषित दस्तावेजों को जोड़ने पर 10 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची से हटाए जाने की संभावना जताई जा रही है। आयोग ने पूर्व में लगभग 58 लाख मतदाताओं को मृत, अनुपस्थित या लापता के रूप में चिह्नित कर प्रारूप सूची से बाहर कर दिया था। सुनवाई चरण के दौरान अतिरिक्त रूप से 10 लाख से अधिक मतदाताओं की पहचान की गई, जिनमें से लगभग 7 लाख सुनवाई में उपस्थित नहीं हुए, जबकि शेष मामलों में दस्तावेज अयोग्य पाए गए।
उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद आयोग ने घोषणा की है कि पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि अभी काफी कार्य शेष है। दस्तावेज सत्यापन की अंतिम तिथि 21 फरवरी निर्धारित है। यदि निर्धारित समय सीमा तक लंबित मामलों का निस्तारण नहीं हो पाया तो अंतिम सूची के प्रकाशन में विलंब हो सकता है।
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के सूत्रों के अनुसार यदि समय पर प्रक्रिया पूरी नहीं होती है तो आयोग समयवृद्धि का अनुरोध कर सकता है।
सुनवाई के दौरान मतदाताओं ने विभिन्न प्रकार के दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनकी जांच सूक्ष्म पर्यवेक्षक कर रहे हैं। आयोग के सूत्रों के अनुसार लगभग 30 लाख मतदाताओं के दस्तावेज पुनः सत्यापन के लिए निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को लौटाए गए हैं। वहीं लगभग 20 लाख मतदाताओं के दस्तावेज अभी भी लंबित हैं और उन पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
आयोग ने एसआईआर के लिए 13 स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची पूर्व में जारी की थी और स्पष्ट किया था कि सूची से बाहर के दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जाएंगे। इस रुख का समर्थन उच्चतम न्यायालय ने भी किया था।
हालांकि, सूत्रों के अनुसार कुछ मामलों में स्वीकृत सूची से बाहर के दस्तावेज जमा किए गए और कथित रूप से स्वीकार भी कर लिए गए, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई। संबंधित अधिकारियों से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है।
बताया जा रहा है कि शेष मामलों का समाधान संबंधित अधिकारियों के साथ आगे की विचार-विमर्श प्रक्रिया के बाद किया जाएगा।
